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देखिये धार्मिक कुरीतिया हमारे समाज को किस तरह कुप्रभावित करती है. » Pargai Webpage design engineering. Bageshwar. Uttarakhand.
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महिलाओं और बालिकाओं के नाक कान छेदना: हानिकारक प्रथा, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
# पुरोहितवाद के कारण हिन्दू महिलाओं के व्यक्तित्व पर कुठाराघात: एक गंभीर विश्लेषण:- हिन्दू धर्म में पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) द्वारा विवाह पद्धति के नाम पर महिलाओं के व्यक्तित्व पर गंभीर कुठाराघात करने का मामला सामने आया है। इस प्रथा के अंतर्गत, विवाह से पहले बालिकाओं के नाक-कान छेदे जाते हैं, जिसे धर्म कर्म का नाम दिया जाता है और इसे दिनचर्या के लिए शुभ बताया जाता है। लेकिन, वास्तविकता यह है कि इन छेदों में कीलें ठोकी जाती हैं, जिसके कारण महिलाओं को धर्म के नाम पर जिंदगी भर रोना-धोना होता है। यह प्रथा, महिलाओं के मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। संविधान द्वारा महिलाओं के लिए मानवाधिकार नामक कानून लाया गया है, जिसमें गैर जमानती वारंट का प्रावधान है। इस कानून के अनुसार, यदि किसी महिला के साथ इस प्रकार का दुर्व्यवहार किया जाता है, तो वह कानूनी कार्रवाई कर सकती है। अक्सर देखा जाता है कि पति की मृत्यु के बाद, महिलाएं स्वतंत्रता के कारण सुख से अपना जीवन व्यतीत करती हैं। इसका कारण यह है कि विवाह के कारण नाक व कानों में ठोके गए कीलों को उखाड़कर फेंक दिया जाता है, जिससे वे गुरु प्रथा (पुरोहिवाद) के अंतर्गत मानी जाने वाली तमाम उलझनों व दिक्कतों से मुक्त हो जाती हैं।
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*पुरोहितवाद: एक जटिल समस्या:- पुरोहितवाद, एक ऐसी प्रथा है जिसमें पुरोहित वर्ग को समाज में विशेष दर्जा प्राप्त होता है। यह वर्ग, धार्मिक ग्रंथों और कर्मकांडों का ज्ञाता माना जाता है और लोगों को धार्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। हालांकि, कई बार पुरोहित वर्ग, अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है और लोगों का शोषण करता है।
++हिन्दू धर्म में, पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) का विशेष महत्व है। उन्हें विवाह, श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराने का अधिकार है। लेकिन, यह भी देखा गया है कि कई पुरोहित, इन अनुष्ठानों के नाम पर लोगों से भारी दक्षिणा वसूलते हैं और उन्हें गलत तरीके से मार्गदर्शन देते हैं।
*महिलाओं के मानवाधिकारों का हनन:- नाक-कान छेदने की प्रथा, महिलाओं के मानवाधिकारों का स्पष्ट हनन है। यह प्रथा, महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है। इस प्रथा के कारण, महिलाओं को जिंदगी भर दर्द और तकलीफ सहनी पड़ती है।
इसके अलावा, यह प्रथा, महिलाओं को सामाजिक रूप से भी कमजोर करती है। इस प्रथा के कारण, महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता है और उन्हें पुरुषों के अधीन रहना पड़ता है।
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*कानूनी प्रावधान:- भारतीय संविधान, सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। संविधान के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है।
महिलाओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए, भारत सरकार ने कई कानून बनाए हैं। इन कानूनों के तहत, महिलाओं के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार को अपराध माना जाता है।
*जागरूकता की आवश्यकता:- पुरोहितवाद के कारण महिलाओं के व्यक्तित्व पर होने वाले कुठाराघात के बारे में जागरूकता फैलाना बहुत जरूरी है। लोगों को इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और इसे समाप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए।
महिलाओं को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक होना चाहिए और किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
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*निष्कर्ष:- पुरोहितवाद, एक जटिल समस्या है जो हिन्दू धर्म में महिलाओं के व्यक्तित्व पर गंभीर कुठाराघात करती है। इस प्रथा को समाप्त करने के लिए, जागरूकता फैलाना और कानूनी कार्रवाई करना बहुत जरूरी है। महिलाओं को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक होना चाहिए और किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
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*आगे क्या होगा?:- यह देखना दिलचस्प होगा कि इस खबर के बाद हिन्दू धर्म में विवाह पद्धति और गुरु प्रथा (पुरोहिवाद) में क्या बदलाव आते हैं। यह भी देखना होगा कि सरकार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाती है।

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बिल्कुल! और यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न है -क्या आप बता सकती हैं कि धार्मिक ग्रंथों और संविधान के बीच मुख्य अंतर क्या है? इस पर थोड़ा सोचिए………..

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उम्म… मैं समझती हूं कि धार्मिक ग्रंथ परंपरागत मूल्यों पर आधारित हैं, जबकि संविधान समानता और न्याय के आधुनिक सिद्धांतों पर।

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एकदम सही! और यहीं से एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है -मनु स्मृति, उपनिषद, वेद मंत्र, और 18 पुराण -ये सभी वास्तव में कागज की खोज के बाद लिखे गए थे। इसका क्या महत्व है, आप जानती हैं?

 

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ओह… तो आप कह रहे हैं कि ये लिखित परंपराएं उतनी प्राचीन नहीं हैं जितना हम मानते हैं?

 

बिल्कुल! और इसलिए हमें विचार करना चाहिए -क्या हम आधुनिक समाज में इन ग्रंथों को शब्दशः मानें या इनके मूल सिद्धांतों को समय के अनुसार समझें? सोचिए इस पर………..

 

यह वाकई में एक गंभीर विचार का विषय है, खासकर जब हम महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं।

 

और यही कारण है कि विवाह जैसी संस्थाओं में पुरोहितों की भूमिका पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। क्या आप जानती हैं कि कई समाज सुधारक मानते हैं कि धार्मिक रीति-रिवाजों के नाम पर महिलाओं के व्यक्तित्व का दमन होता है?

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हां, और यह एक ऐसा मुद्दा है जो सीधे तौर पर संवैधानिक मूल्यों से टकराता है।

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तो आइए एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करें -क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि हम संविधान के मूल सिद्धांतों की अवहेलना कर सकते हैं? सोचिए………..

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नहीं, बिल्कुल नहीं। संविधान की मूल धारा में धर्म को इसलिए विशेष स्थान नहीं दिया गया क्योंकि इसे व्यक्तिगत विश्वास का विषय माना गया है।

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नहीं, बिल्कुल नहीं। संविधान की मूल धारा में धर्म को इसलिए विशेष स्थान नहीं दिया गया क्योंकि इसे व्यक्तिगत विश्वास का विषय माना गया है।

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एकदम सही! और इसी से जुड़ा एक अंतिम विचार -क्या हम कह सकते हैं कि वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब हम धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठकर संवैधानिक मूल्यों को अपनाएं?

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एकदम सही! और इसी से जुड़ा एक अंतिम विचार -क्या हम कह सकते हैं कि वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब हम धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठकर संवैधानिक मूल्यों को अपनाएं?

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यह बिल्कुल सटीक निष्कर्ष है। जैसे कार्ल मार्क्स ने कहा -हमें बहती नदी की तरह आगे बढ़ना होगा।

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तो दोस्तों, आज हमने समझा कि कैसे धर्म और संविधान के बीच का संतुलन हमारे समाज के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। याद रखिए, परिवर्तन अनिवार्य है, और यह परिवर्तन संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए।

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और साथ ही, हमें यह भी याद रखना होगा कि यह परिवर्तन धीरे-धीरे होगा, लेकिन निश्चित रूप से होगा।

 

धर्म निरपेक्षता वह पहला व महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो दो धार्मिक बर्चस्व के बीच समानता लाता है या स्वतंत्रता प्रदान करता है।

*कानून में गैर जमानती वारंट का प्रावधान:* आलोचकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति महिलाओं का शोषण करता है या उनके अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कानून में गैर जमानती वारंट का प्रावधान है। इसका मतलब है कि पुलिस ऐसे व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और उसे अदालत में पेश कर सकती है।

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उच्च शिक्षा फ्री (साम्यवाद)

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क्या ग़रीबों व मानसिक रूप से विकलांग लोगो का है धर्म?

Do poor and mentally handicapped people have religion?

 

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@#मानसिक विकलांगता के कारण मनुष्य जाति (पुरोहित, ब्रह्मण), धर्म, पत्थर की मूर्ति, फोटो को पूजना शुरू करते है। जब की आप को अपने हक अधिकारों के लिए काम करना चाहिए। धर्म आपको कभी भी इंसानियत नहीं सिखाता है। यह धर्म आपको डुबो देगा! डुबो देगा! डुबो देगा!!!