Connection Information

To perform the requested action, WordPress needs to access your web server. Please enter your FTP credentials to proceed. If you do not remember your credentials, you should contact your web host.

Connection Type

स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं, अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको/अध्यापिकाओं पर कार्यवाही आवश्यक है » Pargai Webpage design engineering. Bageshwar. Uttarakhand.
Pargai Webpage design engineering. Bageshwar. Uttarakhand.
स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको पर कार्यवाही आवश्यक है

स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको पर कार्यवाही आवश्यक है

स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको पर कार्यवाही होनी चाहिए

Balwant Singh Pargai Samywadi
++++

जहां शिक्षा का स्तर कमजोर है वहां कुरीतिया और अंध विश्वासओ का भण्डार है।

# स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं और अंधविश्वासों को बढ़ावा देने वाले शिक्षकों पर कार्यवाही आवश्यकता है।

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्रों को ज्ञान और सोचने की क्षमता प्रदान करना है। लेकिन, कुछ अध्यापक कुप्रथाओं और अंधविश्वासों को बढ़ावा देते हैं, जो कि एक गंभीर समस्या है।

#### कुप्रथाएँ और अंधविश्वास

कुप्रथाएँ और अंधविश्वास समाज में गहरी जड़ें जमा चुके हैं। ये न केवल छात्रों के मानसिक विकास को रोकते हैं, बल्कि समाज में भी नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

#### अध्यापकों की भूमिका

अध्यापक छात्रों के लिए आदर्श होते हैं। जब वे अंधविश्वासों और कुप्रथाओं को बढ़ावा देते हैं, तो यह छात्रों के लिए गलत संदेश होता है।

#### कार्यवाही की आवश्यकता

1. *शिक्षा नीति में बदलाव*: स्कूलों और कॉलेजों में कुप्रथाओं के खिलाफ सख्त नियम होने चाहिए।
2. *साक्षरता कार्यक्रम*: अध्यापकों को अंधविश्वासों और कुप्रथाओं के खिलाफ जागरूक करने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
3. *छात्रों की भागीदारी*: छात्रों को भी इस मुद्दे पर अपनी आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

#### निष्कर्ष

कुप्रथाओं और अंधविश्वासों को बढ़ावा देने वाले अध्यापकों पर कार्यवाही होना आवश्यक है। इससे न केवल शिक्षा का स्तर बढ़ेगा, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव भी आएगा।

*स्रोत*: [UNESCO](https://www.unesco.org) के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता विकसित करना भी है।

 

 

#अस्पृश्यता और सामाजिक निर्योग्यता: (Disqualification) एक गंभीर चिंतन

बलवंत सिंह परगाई साम्यवादी मेम्बर ऑफ़ CPIML उत्तराखंड
++++
अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यताएँ (disqualification ) आज भी समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। यह मात्र एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि मानसिकता का परिणाम है। तिलक, सिंदूर और बिंदी जैसी परंपराएँ जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती हैं, जिससे समाज में विभाजन और असमानता बढ़ती है। साथ ही साथ बच्चो के मानसिक स्तर को भी गिरता है. महिलाये इस कुप्रथाओ के चलते हिन् भावना महसूस करती है.
इन प्रथाओं से व्यक्तिगत पहचान प्रभावित होती है और सामाजिक समरसता बाधित होती है। इसलिए, यह ज़रूरी है कि हम इन परंपराओं पर पुनर्विचार करें और समावेशी दृष्टिकोण अपनाएँ। समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए, इन निर्योग्यताओं को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, तभी हम एक सशक्त और समृद्ध समाज की ओर बढ़ सकते हैं। इस विषय पर गहन चिंतन और कार्रवाई की आवश्यकता है।

अस्पृश्यता की जड़ें: तिलक, सिंदूर और बिंदी से भेदभाव?

अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यताएँ समाज में गहरी पैठ बना चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर पर तिलक लगाना या महिलाओं द्वारा सिंदूर और बिंदी का उपयोग करना, अक्सर जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देता है। ये प्रथाएँ व्यक्तिगत पहचान को प्रभावित करने के साथ-साथ समाज में विभाजन और असमानता को जन्म देती हैं। इन प्रतीकों का उपयोग सामाजिक स्थान के निर्धारण के लिए एक प्रकार की निर्योग्यता *( Disqualification) का निर्माण करता है। समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए इन परंपराओं पर पुनर्विचार करना और एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। हमें इन निर्योग्यताओं को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे तभी एक सशक्त समाज का निर्माण हो सकेगा।

अस्पृश्यता की जड़ें और सामाजिक विभाजन: एक पुनरावलोकन की आवश्यकता

समाज में अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यताएँ आज भी गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। तिलक, सिंदूर और बिंदी जैसी कुप्रथा परंपराएँ जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती हैं, जिससे सामाजिक विभाजन और असमानता बढ़ती है। यह प्रथाएँ न केवल व्यक्तिगत पहचान को प्रभावित करती हैं, बल्कि सामाजिक समरसता को भी बाधित करती हैं। इन प्रतीकों का उपयोग सामाजिक स्थान के निर्धारण के लिए करने से एक प्रकार की निर्योग्यता (Disqualification) का निर्माण होता है। इसलिए, इन परंपराओं पर पुनर्विचार करना और एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए इन निर्योग्यताओं को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, तभी हम एक सशक्त और समृद्ध समाज की ओर बढ़ सकते हैं।

जाति और वर्ग आधारित भेदभाव को समाप्त करने की आवश्यकता

अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यताएँ आज भी समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। तिलक, सिंदूर और बिंदी जैसी कुप्रथा परंपराओं का उपयोग जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देता है, जो कि एक गंभीर चिंता का विषय है।
ये प्रथाएँ न केवल व्यक्तिगत पहचान को प्रभावित करती हैं, बल्कि समाज में विभाजन और असमानता को भी जन्म देती हैं। यह आवश्यक है कि हम इन परंपराओं पर पुनर्विचार करें और एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाएँ।
समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए, हमें इन निर्योग्यताओं को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। तभी हम एक सशक्त और समृद्ध समाज की ओर बढ़ सकते हैं।

अस्पृश्यता की जड़ें और सामाजिक विभाजन

अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यताएँ आज भी समाज में गहरी पैठ बनाए हुए हैं। यह समस्या केवल सामाजिक नहीं है, बल्कि हमारी मानसिकता का भी परिणाम है। तिलक, सिंदूर और बिंदी जैसी परंपराएँ अक्सर जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती हैं।
यह प्रथाएँ व्यक्तिगत पहचान को प्रभावित करने के साथ-साथ समाज में विभाजन और असमानता को जन्म देती हैं। सामाजिक स्थान के निर्धारण के लिए इन प्रतीकों का उपयोग एक प्रकार की निर्योग्यता का निर्माण करता है, जो सामाजिक समरसता को बाधित करता है।
इसलिए, हमें इन कुप्रथा परंपराओं पर पुनर्विचार करके समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए, निर्योग्यताओं (Disqualification) को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। तभी हम एक सशक्त समाज की ओर बढ़ सकते हैं।
+++
इस मुद्दे पर आगे की कार्रवाई के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
सरकार को जाति प्रथा और अस्पृश्यता के खिलाफ सख्त कानून बनाने चाहिए।
शिक्षा प्रणाली को इस तरह से सुधारना चाहिए कि यह बच्चों में गणितीय सोच, तार्किक सोच, और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को हिन्दू धर्म के भीतर मौजूद कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, और सामाजिक विषमताओं पर जागरूकता फैलानी चाहिए।
धार्मिक नेताओं को अंधविश्वासों और कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और लोगों को वैज्ञानिक और तार्किक सोच अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

#धर्म के आधार पर मतदान गंभीर अपराध (Supreme Court)

धर्म के आधार पर मतदान एक गंभीर अपराध है। यह न केवल लोकतंत्र की मूल भावना का उल्लंघन करता है, बल्कि समाज में विभाजन और असमानता को भी बढ़ावा देता है। जब लोग अपने धार्मिक विश्वासों के आधार पर वोट डालते हैं, तो यह निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
इस प्रकार का मतदान न केवल राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि यह सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाता है। जब धर्म को राजनीति में घसीटा जाता है, तो इससे नफरत और भेदभाव की भावना को बढ़ावा मिलता है। यह स्थिति समाज में तनाव और संघर्ष का कारण बन सकती है, जो अंततः सभी के लिए हानिकारक है।
इसलिए, यह आवश्यक है कि हम मतदान के दौरान धर्म को एक पक्ष के रूप में न देखें। हमें एकजुट होकर एक ऐसे समाज की दिशा में काम करना चाहिए, जहां सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर मिलें। केवल इस तरह से हम एक मजबूत और समृद्ध लोकतंत्र की स्थापना कर सकते हैं।
+++++
★*हिन्दू धर्म अनेको कुप्रथाओं, अंधविश्वासो, अनेको मनोवैज्ञानिक विकृतियों उत्त्पन्न करने वाले चित्र-मित्र, वातावरण को दूषित करने वाले उपाय, धर्मिक बर्चस्व, बौद्धिक विकास में मंदी उत्पन्न करने वाला( slowing intellectual development), सृजनात्मक शक्तियो को निष्क्रिय करने
वाला ( deactivator of creative forces), हिन्दू धर्म अस्पृश्यता’ से उपजी किसी निर्योग्यता ( any disability arising out of ‘untouchability’), गुरु प्रथा’ पुरोहितवाद जैसे अपवाद से घिरा हुआ है। . ◆”हिंदू” धर्म की परिभाषा में वास्तविकता का अभाव है और यह विभिन्न विषयों में हाल की विद्वता के विपरीत है* इसे निष्क्रिय(नष्ट) कर देना चाहिए।
की शिक्षा बच्चों के लिए अति आवश्यक क्यों?
शिक्षा का स्तर इस तरह का होना चाहिए कि+।
https://pargaiwebeng.in/hinduism-evil-practices…/
***
@ब्राह्मणवाद की जड़े बहुत गहरी है और सारी विषमता का कारण भी ब्राह्मणवाद ही है। हिंदू नाम का कोई धर्म है ही नहीं, हिंदू धर्म केवल धोखा है। सही मायने में जो ब्राह्मण धर्म है, उसी ब्राह्मण धर्म को हिंदू धर्म कहकर के इस देश के दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों को अपने धर्म के मकड़जाल में फंसाने की एक साजिश है। अगर हिंदू धर्म होता तो आदिवासियों का भी सम्मान होता है, दलितों का भी सम्मान होता, पिछड़ों का भी सम्मान होता लेकिन क्या विडंबना है…

#हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं__ सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय: ‘हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं, एक जीवन शैली है; कुप्रथाओं और अंधविश्वासों से मुक्त करना आवश्यक’*
नई दिल्ली:* उच्चतम न्यायालय में एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान, हिन्दू धर्म की परिभाषा पर बहस छिड़ गई। कुछ याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ‘हिंदू’ धर्म की परिभाषा में वास्तविकता का अभाव है और यह विभिन्न विषयों में हाल की विद्वता के विपरीत है। उनका तर्क है कि इसे निष्क्रिय (नष्ट) कर देना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने ‘हिंदू धर्म’ के भीतर मौजूद कुछ कुप्रथाओं, अंधविश्वासों और मनोवैज्ञानिक विकृतियों की ओर इशारा किया। उनका कहना है कि धार्मिक वर्चस्व और पुरोहितवाद बौद्धिक विकास में मंदी उत्पन्न करते हैं और सृजनात्मक शक्तियों को निष्क्रिय करते हैं। याचिका में ‘अस्पृश्यता’ से उपजी किसी निर्योग्यता और ‘गुरु प्रथा’ जैसे अपवादों का भी उल्लेख किया गया है।
मामले की सुनवाई करते हुए, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू धर्म को एक धर्म के बजाय एक जीवन शैली के रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि शिक्षा बच्चों के लिए अति आवश्यक है, और शिक्षा का स्तर इस तरह का होना चाहिए कि वे अंधविश्वासों और कुप्रथाओं से मुक्त होकर तर्कपूर्ण ढंग से सोच सकें।
न्यायालय ने माना कि हिंदू धर्म में कुछ ऐसी प्रथाएं हैं जो समय के साथ विकसित हुई हैं और जिनका अब कोई औचित्य नहीं है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इन प्रथाओं को दूर किया जाना चाहिए ताकि हिंदू धर्म अपने मूल स्वरूप में वापस आ सके।
शिक्षा का महत्व
न्यायालय ने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा अंधविश्वासों और कुप्रथाओं को दूर किया जा सकता है। शिक्षा के माध्यम से ही लोग तर्कपूर्ण ढंग से सोचने और सही और गलत के बीच अंतर करने में सक्षम हो पाएंगे।
निष्कर्ष
*उच्चतम न्यायालय का यह फैसला हिंदू धर्म के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू धर्म को अंधविश्वासों और कुप्रथाओं से मुक्त करना आवश्यक है। शिक्षा के माध्यम से ही यह संभव हो पाएगा कि हिंदू धर्म अपने मूल स्वरूप में वापस आ सके और एक प्रगतिशील और आधुनिक समाज का निर्माण कर सके।

अन्य महत्वपूर्ण बातें:

* न्यायालय ने सरकार से हिंदू धर्म में मौजूद कुप्रथाओं को दूर करने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया।
* न्यायालय ने कहा कि हिंदू धर्म को एक समावेशी धर्म होना चाहिए जो सभी लोगों का स्वागत करे, भले ही उनकी जाति, पंथ या लिंग कुछ भी हो।
* मामले की अगली सुनवाई अगले महीने होगी।
+++
★राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं व विभागो में न तो किसी धर्म का प्रचार किया जाएगा न ही कोई धर्ममिक शिक्षा दी जाएगी और न ही किसी भी धर्म के आचरण एवं अनुसरण की अनुमति दी जाएगी। ( को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।*)
★इन बातों से स्पष्ट होता है कि संविधान मैलिक अधिकारों की हर सम्भवतः रक्षा करेगा। पूर्ति के लिए एक लंबी सूची तैयार करेगा और कोई ऐसा अन्य तरीका खोजेगी उन्हें व्यवहार में लाया जा सके और उल्लंघन होने पर अधिकारों की रक्षा की जा सके। सरवोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय मैलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सरकार को आदेश और निर्देश देतेे है।
#धर्म मौलिक अधिकारों की क्षेणी में नही आता है।
++
#राजनीत का सम्बन्ध सीधे समाज से है (कार्ल मार्क्स)
#राजनैतिक सिद्धांत दावा करते है दावा करते हैं सामाजिक परिर्वतन व सामाजिक न्याय के लिए।
सामाजिक न्याय
#सामाजिक न्याय की बात करते हुए हमें नीत निर्देशक सिद्धान्तों की बात भी नहीं भूलनी चाहिए। धार्मिक समुदायो को मान्यता न देकर इस समस्या का समाधान आसानी से किया जा सकता है। माना जाता है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म को निजी मामला के रुप में स्वीकार करते है। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है।लोकतंत्र का मतलब है साथर्क भागीदारी धर्मनिरपेक्षता, पंथनिरपक्षता या सेक्युलरवाद धार्मिक संस्थानों व धार्मिक उच्चपदधारियों से सरकारी संस्थानों व राज्य का प्रतिनिधित्व करने हेतु शासनादेशित लोगों के पृथक्करण का सिद्धान्त है। यह एक आधुनिक राजनैतिक एवं संविधानी सिद्धान्त है।
++
क्या ग़रीबों व मानसिक रूप से विकलांग लोगो का है धर्म?
#मानसिक विकलांगता के कारण मनुष्य जाति (पुरोहित, ब्रह्मण), धर्म, पत्थर की मूर्ति, फोटो को पूजना शुरू करते हैं।
@#जबकि आपको अपने हक आधिकारों के लिए काम करना चाहिएं।
#धर्म आपको कभी भी इंसानियत नही सिखाता है। यह धरम आपको हुबो देगा डुबो देगा डुबो देगा।
++
स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं, अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको/अध्यापिकाओं पर कार्यवाही आवश्यक है
https://pargaiwebeng.in/action-is-necessary-against…/